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मनोरञ्जन विचार साहित्य

सात समुन्दर के मोती ! (भोजपुरी कविता)

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पर्सा, २९ जेठ

सडीयन के उलटत-पुलटत
देख के,
सखी- सलेहर
करेली सs बतकुच्चन
बुढ मेहररुअन लेखा
करेले इ
एह कोठी के धान
ओह कोठी
संजोगे ले अइसे
जैसे सात समुन्दर के मोती।

अब का कहि उनके
खाली कपड़ा नइखे
इ त हमरा खाती
एगो पाती
प्यार के,दुलार के,नेह के,छोह के।

संजोगे खाती एहके
हमार पर पाटी में
कतना अथक बा
हमार बाबू के
या कतना परब बीतल
पुरान साड़ी में
हमार माई के
काहे की
जब हम जाई ससुरा
त कोनो कमी न होखे।

इ बुलुका
नानी रहे दिहले
तब, जब!
न रही हम
दुइयो फिट के
देखले रहे हुनकर आंख
एगो सपना
की बुचिया लानी
सुन्नर कतना।

हइ पियरकी
चाचा ओली
लागेला जैसे
उनके उगावल सरसों के
सवसे रंग
छिटाइल होखे
एह साड़ी पे तइसे।

हं! इ मेहंदी वाली
ले आइल रहे
हमार छोटकी फुआ
काहे कि लड़िकाइं में
इहे रंग चुनरी से
बनत रहे
उनके गुड़िया
दुलहिन।

पाढ़ वाला हइ
चेन्नई से लवले रहे
छोटका भाई
आ कहत रहे
माई से
ओसारा में
दिदिया हमर
लागी एहमे
एकदमे
परी सन्न।

करs लो बतकुच्चन
न सुनम
हम त बस करम
एह कोठी के धान
ओ कोठी
काहे की
हं, इ त बडुवे
हमार हीरा मोती
सात समुन्दर के
सबसे अनुपम मोती।।

विजया शर्मा( लेखिका )

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