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ऐतिहासिक आ पुरातात्त्विक महत्त्व से चिन्हाए वाला सिम्रौनगढ

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वीरगन्ज । ऐतिहासिक आ पुरातात्त्विक महत्त्व से चिन्हाए वाला सिम्रौनगढ के हीं नाम से मधेस-प्रदेश अन्तर्गत बारा जिल्ला के दक्षीण पुर्व भाग में सिम्रौनगढ नगरपालीका बनावल बा। सिम्रौनगढ बीरगंज से २८ किलोमिटर पुर्व में आ काठमाण्डौं से दक्षिण ९० किलोमिटर सिधा दुरी में अवस्थित बा। किताबन्दी रहल सिम्रौनगढ के परिधि के (बाही) कहल जाला। एकर आकार आयतकार रुप में बा आ उत्तर-दक्षिण में ६ किलोमिटर आ पुर्व पश्चिम में ४.५ किलोमीटर बा। तिरहुत क्षेत्र भर कर्णाटकाल के मुर्ति,पोखरा,ईनार,दुर्गा,भित्ता,खण्डर तथा अन्य पुरातात्त्विक अवशेष व्याप्त बा। सिम्रौनगढ कर्नाटवंश के राजधानी भयीला के कारण ईहां अईसन वस्तु सब मिलल करेला। सिम्रौनगढ पुरातात्त्विक स्थल ह सिमरा वनगढ,सिम्मन गाडा,पाटा ईत्यादी के नाम से परिचित बा।

ईहां से ११ औं से १४ औं शताब्दी के (सिम्रौन राज्य) अथवा “कर्नाटवंशी” राज्य आ १८०० वर्ष पुरान गुप्ताकाल के विभिन्न पुरातात्त्विक कलाकृती आ पुरावशेष मिलल बा । “सिम्रौन” राज्य के ग्यासुद्दीन तुग्लक सन १३२४ में पराजित कयीला पर उहाँ के अन्तिम राजा हरि सिंह देव पहाड ओरी जा के काठमाण्डौं उपत्यका ले मल्ल राजवंश में समाहित होगईल रहलें। एकर शासन के क्रम में उपत्यका के कला,शिल्प,साहित्य आ वस्तु के क्षेत्र में उच्चतम विकास हासिल कयील ईतिहासविद लोग बतावेला।

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बलि ना चढावे वाला संसार के एकलौता हिन्दु धर्म शक्ति पिठ के नाम से परिचित कंकाली मन्दिर एहि क्षेत्र में परेला। १२ औं शताब्दी में तत्कालीन राजा शिव सिंह द्वारा निर्माण कयील महत्त्वपूर्ण राष्ट्रीय सम्पती रानीवास मन्दिर भी आपन अलगे पहिचान बनवले बा। राष्ट्र के सबसे बडका पोखरा भी एह में चार चांद लगईले बा। एहि नगर के हरिहरपुर में अवस्थित एगो विशाल पत्थर के बाकस में रहस्यमय सन्दर्भ बा। सन १७३९ में इटालियन पादरी क्यासिनो अंग्रेज विद्वान ब्राइन हड्सन तक एह क्षेत्र के अनुसन्धान करे के समय में जवन पुस्तक लिखले रहलें ओहु में एकरा के रहस्यमय तरिका से निष्कर्ष दिहले रहलें। अभहियो इहां के खेत खोनला पर तिरहुत सभ्यता के सोना चान्दी के मुर्ती आ समान सब मिलल करेला।

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भक्तपुर वास्तुकला में सिम्रौनगढ के बहुत बडका प्रभाव देखे के मिलेला। सबसे अधिक तराई क्षेत्र के लोग के लेया के बसोबास करावे के कार्य भी भक्तपुर ही कयीले बा। सिम्रौनगढ के राजा भक्तपुर शहर के जोडे खातीर भक्तपुर-बनेपा-सिन्धुली होते हुए रास्ता बनवले रहलें एकर ईतिहास बा उपत्यका के तिनो शहर के लोग ओही रास्ता होते हुए पटना,बोधगया,काशी जाला लोग। गण्डक नहर के किनारे-किनार पुर्व ओर से महागढीमाई नगरपालीका पचरौता नगरपालीका आदर्श कोतवाल गाउँपालीका छुवते करीब २० किलोमिटर यात्रा कयीला पर सिम्रौनगढ पुगल जाला। नहर से जुडल सडक धुरे धुरा से भरल बा। सिम्रौनगढ पुगे खातीर वीरगंज आ कलैया से सार्वजनिक बस भी उपलब्ध बा।

राजा नान्यदेव सन १०९७ में ईहँवे से कर्णाटवंश के स्थापना कयीले रहलें। उनका बाद गंग देव,राम सिंह देव आ हरि सिंह देव ईहँवा राज कईलख लोग। ओह बेरा सिम्रौनगढ राज्य कोशी से ले के गण्डकी आ महाभारत शृङ्खला से ले के गंगा सिमाना तक फैलल रहे। प्रथम शासक नान्यदेव से ले के अन्तीम शासक हरि सिंह देव तक ले के राज्यकाल में गदी,गैंडा,प्रशासनिक केन्द्र में कुलदेवी के रुप में तुलजा भवानी के पुजास्थल स्थापना कयील रहे। मल्लकालीन नेपाल के इतिहास में वास्तुकला स्वर्ण युग के रुप में परिचित बा। राजधानी के कला,संस्कृति,वास्तुकला के चेत में सिम्रौनगढ के योगदान मिलल बा। लेकीन सिम्रौनगढ अभी मछरी के पोखरा बन के रह गयील बा। सिम्रौनगढ के ईतिहास पुर्ण रुप से नष्ट भयील जईसन हीं आभास होला। ईतिहास के केतन्न चिन्हा त एही मछरी के पोखरा में भुला गयील बा। सिम्रौनगढ नगर के बस्ती कहाँ से शुरु हो के कहाँ खत्तम भयील बा पत्ता लगावे खातीर नक्शे देखे के परी।

१४ औं शताब्दी के अन्त में बंगाल विजय कर के लौटे के क्रम में दिल्ली के वादशाह ग्यासुद्दीन तुगलक के सेना के आक्रमण कयीला से सिम्रौनगढ के बहुत ऎतिहासिक,धार्मिक स्थल तहसनहस होगईल। पूरा राज्य ध्वस्त होगईल। अन्तिम राजा हरि सिंह देव तलेजु भवानी के साथ में ले के भक्तपुर ओर भगलो पर पहुँचे ना सकलन। रश्ते में उनकर मृत्यु होगईल। रानी देवल देवी पुत्र जगत सिंह सहित भक्तपुर के राजा रुन्द्र मल्ल किहां शरण लेवे पुगली। ईतिहास में पढे के मिलेला रुद्र मल्ल के बेटी नायक देवी से जगत सिंह के विवाह भयील। नायक देवी आ जगत सिंह के एकलौती बेटी राजल्ल देवी से जयस्थिती मल्ल के विवाह से उपत्यका के शासन सत्ता में दोसर मल्लकाल के राजा उदय भयील। जवन पृथ्वीनारायण शाह के एकीकरण अभियान तक ले कायम रहे।

सम्पूर्ण सिम्रौनगढ अब कहिँ विलिन होगईल बा। टुक्रा-टुक्रा में सिम्रौनगढ अब तनि मनी बचल खुचल बा। नेपाल सरकार पर्यटकीय प्रबल संभावना वाला १०० गो स्थान के खोज के पर्यटकीय गन्तव्य के रुप में विकास करे के कार्यक्रम बनवले रहले। एह अन्तर्गत संस्कृति,पर्यटन तथा नागरिक उड्ड्यन मन्त्रालय प्रवर्द्धन करे खातीर नयाँ १०० गो पर्यटकिय स्थल में से बारा जिल्ला स्थित सिम्रौनगढ भी छनोट भयील रहे।

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